सफर पर चले हम उस समन्दर को पार करने,

दो कदम भी नहीं जा पाए की पानी में समां गए ।

वो कागज की कश्ती थी जींस में हम सवार,

गहराइयों में डूब हम उस विशालता में विलीन हुए ।

ना धूप थी ना छाया,

बस था घना अंधेरा ।

अब तो परछाई भी साथ छोड़ गई,

क्या मोल था तेरा ओ सवेरा ।

खामोशियां गुंज रही थी,

इस बेहाल दिल की दास्तान ।

पलक झुकाए राह तक रहे थे,

वो ना जो आने वाला था ।